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गंगा में प्रदूषण बरकरार रहने पर उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट सख्त हुआ

हाईकोर्ट सख्त लहजे मैं कहा; जब एसटीपी से शोधन काम नहीं हो रहा तो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और केंद्रीय परियोजना को क्यों न समाप्त कर दें !

News story by Kunwar Ashok S Rajput,

Pryagraj Allahabad,July-28; गंगा नदी में प्रदूषण बरकरार रहने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खाशी नाराजगी जताई और कोर्ट ने कहा है कि अरबों रुपये खर्च किये जाने के बावजूद गंगा अब तक साफ क्यों नहीं हो सकी है। कोर्ट ने जलशक्ति मंत्रालय के अंतर्गत नमामि गंगे योजना के तहत करोड़ों खर्च के बाद भी स्थिति में बदलाव न आने पर तल्ख टिप्पणी की।  वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स को निजी हाथों में देने से भी कोई फायदा नहीं हुआ क्यूंकि निजी सेक्टर को नमामिगंगे परियोजना के माध्यम से एसटीवी स्थापना कार्य 2020 तक पूरा किया जाना था जबकि रिपोर्ट 10 प्रतिशत पूरा होने की जानकारी हुई है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंगा प्रदूषण मामले में नमामि गंगे परियोजना के महानिदेशक से पूछा लिया है कि क्लीन गंगा के मद में कितना धन आवंटित किया गया है और यूपी को कितना धन दिया गया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि क्या धन योजना उद्देश्य पूरा करने में ही खर्च किया गया है। हाईकोर्ट की तीन जजों की लार्जर बेंच ने डायरेक्टर जनरल नमामि गंगे परियोजना को खर्च का ब्यौरा पेश करने के लिए एक महीने की मोहलत दी है। अदालत इस मामले में इकतीस अगस्त को फिर से सुनवाई करेगी।

याचिका में यह भी कहा गया कि यूपी में एसटीपी यानी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ठीक से काम नहीं कर रहे हैं इसके संचालन की ज़िम्मेदारी अडानी ग्रुप के पास है। एसटीपीज के ठीक से काम नहीं करने की वजह से गंगा की हालत कमोवेश जस की तस बनी हुई है। महीने की एवरेज रिपोर्ट पेश की, जितना गंदा पानी उत्सर्जित हो रहा है उससे काफी कम क्षमता के प्लांट हैं। पानी अधिक आया तो कंपनी शोधन की जिम्मेदारी नहीं लेगी, ऐसा करार कर लिया गया है। कंपनी बिना शोधन पैसे ले रही। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपना दायित्व नहीं निभा रहा। गंदा पानी गंगा में जा रहा, कार्रवाई किसी पर नहीं हो रही। याचिका पर न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता अरूण कुमार गुप्ता, वीसी श्रीवास्तव, अपर महाधिवक्ता नीरज त्रिपाठी, शशांक शेखर सिंह, डा एच एन त्रिपाठी, राजेश त्रिपाठी सहित दूसरे अधिवक्ताओं ने भी पक्ष रखा। कोर्ट को बताया गया कि गंगा किनारे प्रदेश में 26 शहर है अधिकांश‌ मे एसटीपी नहीं है और सैकड़ों उद्योगों का गंदा पानी सीधे गंगा में बिना शोधन के गिर रहा है।

जनहित याचिका की सुनवाई कर रही इलाहाबाद हाईकोर्ट की पूर्णपीठ चीफ जस्टिस राजेश बिंदल, जस्टिस एम के गुप्ता और जस्टिस अजित कुमार ने नाराजगी जताते हुए कहा कि जब ऐसी संविदा है तो शोधन की जरूरत ही क्या है? कोर्ट ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा कोई कार्रवाई नहीं करने पर कहा कि बोर्ड साइलेंट इस्पेक्टेटर बना हुआ है, कानून में बोर्ड को अभियोग चलाने तक का अधिकार है। कोर्ट ने कहा जल निगम एसटीपी की निगरानी कर रहा है लेकिन उसके पास पर्यावरण इंजीनियर नहीं है। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि गंगा में साफ और शोधित जल नहीं जा रहा है। कानपुर में लेदर इंडस्ट्री, गजरौला में शुगर इंडस्ट्री की गंदगी बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे तौर पर गंगा में गिर रही है। इन फैक्ट्रियों के गंदे पानी के साथ ही शीशा, पोटेशियम और अन्य रेडियोएक्टिव चीजें गंगा को सीधे गिरकर उसके जल को प्रदूषित कर रहीं हैं।

कोर्ट ने कहा, जल निगम द्वारा प्रयागराज में आने वाली भीड़ व घरों में लगे वाटर पंप के पानी को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट योजना में शामिल नहीं किया  केवल जल आपूर्ति व भविष्य की आबादी पर योजना लागू कर दी। कोर्ट ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन को निर्देश दिया है कि वह प्रयागराज के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट व नालों के प्रदूषण की जांच कर ऐक्शन ले ।बुधवार को गंगा प्रदूषण मामले की सुनवाई के दौरान बड़ा खुलासा भी हुआ। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट अडानी की कंपनी चला रही है और करार है कि किसी समय प्लांट में क्षमता से अधिक गंदा पानी आया तो शोधित करने की जवाबदेही नहीं होगी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसे करार से तो गंगा साफ होने से रही। कोर्ट ने कहा ऐसी योजना बन रही जिससे दूसरों को लाभ पहुंचाया जा सके और जवाबदेही किसी की न हो ।

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